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जिस दिन मैं न रहूँगा

26 May

जिस दिन मैं न रहूँगा

तुम तलाशोगे मुझको

मेरी बातों में,

मेरे शब्दों में,

मेरी कृतियों में

मगर बीते समय सा विवश

मैं फिर कभी न लौट पाऊँगा ।

जिस दिन मैं न रहूँगा ।

तुम तलाशोगे मुझको

पंछियों के मधुर गीत में,

प्रकृति के आह्लादित संगीत में,

नदियों के कंपन में,

सागरों की थरथराहट में,

हर कण, हर क्षण में

मगर बहती वायु सा विवश मैं

फिर कभी न लौट पाऊँगा ।

जिस दिन मैं न रहूँगा

तुम तलाशोगे मुझको

अपनी मुस्कराहट में,

अपनी खिलखिलाहट में,

धरा पर, नभ पर

मगर टूटे सितारे की 

नियति सा विवश मैं

फिर कभी न लौट पाऊँगा ।

जिस दिन मैं न रहूँगा

तुम तलाशोगे मुझको

अपने हृदय के स्पंदन में,

अपनी साँसों के शोर में,

अपनी हिचकियों में,

अपनी सिसकियों में

मगर वेगमयी जलधारा 

सा विवश मैं

फिर कभी न लौट पाऊँगा ।

जिस दिन मैं न रहूँगा,

तुम तुम न रहोगे,

ज़मीं ज़मीं न रहेगी,

आसमां आसमां न रहेगा

जिस दिन मैं न रहूँगा,

जिस दिन मैं न रहूँगा ।।

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2 Comments

Posted by on May 26, 2017 in poems

 

2 responses to “जिस दिन मैं न रहूँगा

  1. Raja Dewangan

    September 1, 2017 at 10:59 PM

    बहुत ही शानदार 👌👌👌👌👌

    Liked by 1 person

     

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