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ऐ मेरे हमसफ़र

25 Feb

ऐ मेरे हमसफ़र, मेरे नाजनीन मेरे रहनुमा !! तेरी ख़ूबसूरती को बयां करने के लिए मुझे किसी के इजाजत की जरूरत नहीं

ये कुदरत भी तेरे ख़ूबसूरती के कहर से वाकिफ है जो तेरे हुस्न के जलजले से दहल जाया करती है

अब ये मत कहना कि हम तेरी तारीफों के पुल यूँ ही बाँध रहें, वो तो तेरी ख़ूबसूरती का कायल ये दिल है जो बरबस लिखने पर मजबूर कर देता है, और जब लिखने बैठते हैं तो तेरी तुझसे ज्यादा कुछ लिख नहीं पाते

कहाँ से लिखना शुरू करूँ??

मालूम नहीं इस सवाल का जवाब, लेकिन फिर भी लिखते हैं, उस हसीं चेहरों को जिसकी चमक से आसमान के सितारे धूमिल नज़र आते हैं

इक जंग सी छिड़ी हुयी है खुद में कि क्या लिखूं जो तेरे जैसा हो

कभी दिल कहता है कि तुम्हारी खूबसूरत आँखों में डूब जाएँ, तो कभी कहता है कि इन लरजते होठों कि ख़ूबसूरती देखते रहें

कुदरत भी तेरे रहमो-करम से अनजान नहीं

वो हवाएं भी कितनी खुशनसीब होंगी जो तेरे जुल्फों को छू कर गुजरती होंगी, और उन हवाओं को मेरा शुक्रिया पहुँचता रहे जो तेरी ख़ुशबू को मुझ जैसे ना-चीज़ तक लाती हैं

और सुनो!

कभी अपनी आँखों और भौहों को देखा है गौर से? नहीं ना? मुझे मालूम था तुम कहाँ गौर करती होगी खुद पर? ये तो हम हैं जो तेरी ख़ूबसूरती के कायल हैं जो तुम्हें कतरा-कतरा तराशते हैं.

तुम्हारी भौहें दूर से दिखती, पहले चढ़ती फिर गिरती किसी पर्वत श्रृंखला सी खूबसूरत हैं, और आँखें उन पर्वतों के आँचल में किसी झील सी, मोहब्बत के रंगों से भरी हैं

कहाँ चल दी तुम? ख़त अभी बाकी है- कुछ बाकी रह गया है तारीफ़ में तुम्हारे

वो तेरा पलकें झपकाना भी क्या गजब ढाता है, मानो तितलियाँ उड़ते-उड़ते अपने रंग-बिरंगे फड़फड़ा रहीं हैं

और तेरी मुस्कराहट सितारों कि चमक को फ़ीका करने वाले आधे चाँद की ख़ूबसूरती को फ़ीका कर रही है

और तेरे सुर्ख लाल होठों से समंदर के मूंगे कि चट्टान का लाल रंग ढलता जा रहा है

गालों के गुलाबीपन से गुलाब मुरझा रहे हैं

ये तो कहर है कुदरत पर जो तेरे हुस्न से बरपाया जा रहा है

मेरी कलम यहाँ तेरी तारीफें बुन रही है, और मैं तुम में कहीं दूर खोता जा रहा हूँ जहाँ मैं तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लिए चल रहा हूँ

मैं महसूस कर रहा हूँ तेरे चेहरे पर मेरी तारीफों का गुलाबी रंग और तेरी पहले से भी ज्यादा खूबसूरत आँखें जो मुझे ता-उम्र देखते और चाहते रहने का वादा करती हैं, वो मुझसे कह रही हैं कि अब बस भी करो ना?

पर मेरी कलम कभी थकती नहीं तेरी तारीफें करते-करते

वो रुकने का नाम नहीं लेगी, वो तो हर पल इक नया शब्द तेरी तारीफों की किताब में जोड़ती रहेगी

Picture source -google-Megan Fox Portrait

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2 Comments

Posted by on February 25, 2018 in poetry, random thoughts

 

2 responses to “ऐ मेरे हमसफ़र

  1. myexpressionofthoughtsblog

    February 25, 2018 at 11:04 PM

    A beautiful love for the humsafar

    Liked by 1 person

     

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