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सुनो जान

15 Feb

सुनो जान

चेहरे को दोनों हाथों से थामकर पहला चुंबन माथे पर देकर मैं देर तक चेहरा ही तकता रहा तुम्हारा।
कुछ कहना चाहता था मैं किन्तु तुम्हारे लिए अलंकार नहीं बचे थे पास मेरे। शब्द पीछे होकर रह गए थे, नज़र टकटकी लगाए जम गई थी उस पल।
माथे से सरककर मेरे होंठ तुम्हारी गहरी आँखों पर आए जबकि मैं आँखों की तारीफ करना चाहते हुए भी ना कर पाया और छोड़ दिए नयनों पर होंठों पर लगे‌ सुर्ख लाल के निशान।

मैं सिहर गया था हमारे अधरों के टकराने पर जब तक कुछ संभल पाता तब तक तुम्हारा चेहरा मेरे सीने पर अपने होने को साबित कर चुका था।

चेहरे पर मेरे रंग की तरह जमे हो तुम। मेरा सांवला तुम्हारा गेंहू आ मिलकर कुछ तीसरा गढ़ देता है जो उगते सूरज की लालिमा सी रंगत मुझे दे जाता है। रंगत ये तुमसे ही है। तुम्हारी आँखों में काजल से लगे हो, काजल का काला और आँखों का धूसर मिलकर एक तीसरा रंग रंगता है, ।  होंठो के नीचे  काले तिल के रूप में बैठे हो, दूसरों की सीधी नज़रों को आने से रोकने के लिए। 

मेरी उंगलियाँ तुम्हारे बालों में अटक कर उस पल को वहीं रोक कर दुनिया के रुक जाने का एहसास देती हैं। दुनिया का रुक जाना कोई कम बात तो नहीं। इन पलों में मेरे बोलने से तुम्हें सख़्त ऐतराज़ है, ‘क्यों बोलती हो? क्यों कम कर रही हो इन पलों को अपने शब्दों से? मेरे साथ बहो बस कुछ बोलो मत।”

मेरे सीने पर धरा तुम्हारा चेहरा दुनिया की तमाम चाहतों और सुकून को चिढ़ाता हुआ मुझे किसी फ़रिश्ते को अपने आगोश में लेकर सोने के मखमली एहसास से लबरेज़ कर देता है। तुम्हारें हाथों में सिमटा मेरा चेहरा… ना, इस एहसास को अनकहा रहने दो।

कितने अलंकार रहते हैं मेरे  तुम्हारे पास मेरे लिए जबकि मेरे पास तुम्हें प्यार करते रहने के अलावा और कोई अतिशयोक्ति ही नहीं ।

 
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Posted by on February 15, 2020 in random thoughts

 

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